आज कुछ बहुत अलग मुद्दे पे लिख रहा हूँ शायद लिखने की जरुरत हैं या नही, किसी को फर्क पड़ता हैं या नही..पता नही।
बचपन में कभी-कभी किसी को गलती से गाली दे दिए तो मम्मी कहती थी..बेटा गाली नहीं देते। गाली सामने वाले को नहीं खुद को ही लगती हैं। मैं इस बात को समझ नही पाता था। अब जाकर मैं इस बात को समझने लगा की अगर आप किसी को गाली दे रहे हो, किसी के प्रति असभ्य भाषा या कटु शब्दो का प्रयोग करते हो..तो आप सामने वाले का कुछ नही, खुद का चरित्र-हनन कर रहे हो।
आप जानते हैं पक्ष-विपक्ष सदियों/इतिहासों से चला आ रहा हैं। ये सिर्फ आपके देश में नहीं पूरी दुनिया में विद्यमान हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तो देवताओं में भी असहमति रहती थी। बिना विपक्ष के पक्ष का, बिना विरोध के समर्थन का कोई मजा नही।
लेकिन आजकल एक अलग चलन हो गया हैं। अगर सामने वाले के हिसाब से आपके विचार नही मिलते, प्रतिक्रियाएं नहीं मिलती तो आप उन्हें गाली देना शुरू कर देते हैं, उसका उपहास करने लगते हैं, उसे दोगला साबित कर देते हैं। उसके माँ-बहन, परिवार तक को नहीं छोड़ते। लेकिन आप उसी माँ के उदाहरण की तरह सामनेवाले को नहीं, खुद की मानसिकता..खुद की विकृति को दर्शातें हैं।
मेरे हिसाब से माँ-बाप कैसे भी हो..अमीर-गरीब, चोर-पुलिस, ब्राह्मण-सूद्र जो भी हो....कुछ दे न दे, अपने बच्चों को संस्कार देने की भरपूर कोशिश करते हैं। और संस्कार सिर्फ पैर छूना, मंदिर जाना ही नहीं..खुद में विनम्रता, शालीनता, सभ्य भाषा शैली और सम्मान का होना बहुत जरुरी हैं। और इन संस्कार का ढोंग आप अपने माता-पिता के सामने तो कर देते हैं लेकिन असल में सच्चाई क्या हैं आप खुद जानते हैं। सब रिश्ते नाते, सब दोस्ती, सब प्यार, सब धार्मिक एकता खत्म होने लगती हैं क्योंकि वो आपकी मूढ़ता, मूर्खता से सहमत नही हैं। आप जो जी में आएं उसे कुछ भी साबित कर देते हैं। सबकी अपनी सोच हैं भैया.. ऐसा नही हैं कि जो मोदी को समर्थन नही करते हैं वो पाकिस्तान चले जाएं। मैं खुद मोदी का बहुत बड़ा प्रशंशक हूँ विरोधियों पे तंज भी कसता हूँ, उनका मजाक भी बनाता हूँ लेकिन कभी किसी व्यक्ति विशेष पे असभ्य भाषा का इस्तेमाल नही किया और न ही अपमानित करने की कोशिश की।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बहुत मायने रखती हैं और अगर उसके कुछ नकारात्मक परिणाम हैं भी तो..उसके लिए व्यवस्थाएं हैं, सिस्टम हैं। लेकिन ये स्वतंत्रता बहुत जरुरी हैं वरना महान लोकतंत्र में रहने का कोई फायदा नहीं। और इन स्वतंत्रता पे भड़ास निकालने वाले, टिपण्णी करने वाले, बस खुद सही और दूसरों को गलत साबित करने वाले..किसी मानसिक अवसाद से पीड़ित लोग हैं जो अपनी कुंठा को शांत करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। किसी भी नीचता तक जा सकते हैं।
बचपन में कभी-कभी किसी को गलती से गाली दे दिए तो मम्मी कहती थी..बेटा गाली नहीं देते। गाली सामने वाले को नहीं खुद को ही लगती हैं। मैं इस बात को समझ नही पाता था। अब जाकर मैं इस बात को समझने लगा की अगर आप किसी को गाली दे रहे हो, किसी के प्रति असभ्य भाषा या कटु शब्दो का प्रयोग करते हो..तो आप सामने वाले का कुछ नही, खुद का चरित्र-हनन कर रहे हो।
आप जानते हैं पक्ष-विपक्ष सदियों/इतिहासों से चला आ रहा हैं। ये सिर्फ आपके देश में नहीं पूरी दुनिया में विद्यमान हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तो देवताओं में भी असहमति रहती थी। बिना विपक्ष के पक्ष का, बिना विरोध के समर्थन का कोई मजा नही।
लेकिन आजकल एक अलग चलन हो गया हैं। अगर सामने वाले के हिसाब से आपके विचार नही मिलते, प्रतिक्रियाएं नहीं मिलती तो आप उन्हें गाली देना शुरू कर देते हैं, उसका उपहास करने लगते हैं, उसे दोगला साबित कर देते हैं। उसके माँ-बहन, परिवार तक को नहीं छोड़ते। लेकिन आप उसी माँ के उदाहरण की तरह सामनेवाले को नहीं, खुद की मानसिकता..खुद की विकृति को दर्शातें हैं।
मेरे हिसाब से माँ-बाप कैसे भी हो..अमीर-गरीब, चोर-पुलिस, ब्राह्मण-सूद्र जो भी हो....कुछ दे न दे, अपने बच्चों को संस्कार देने की भरपूर कोशिश करते हैं। और संस्कार सिर्फ पैर छूना, मंदिर जाना ही नहीं..खुद में विनम्रता, शालीनता, सभ्य भाषा शैली और सम्मान का होना बहुत जरुरी हैं। और इन संस्कार का ढोंग आप अपने माता-पिता के सामने तो कर देते हैं लेकिन असल में सच्चाई क्या हैं आप खुद जानते हैं। सब रिश्ते नाते, सब दोस्ती, सब प्यार, सब धार्मिक एकता खत्म होने लगती हैं क्योंकि वो आपकी मूढ़ता, मूर्खता से सहमत नही हैं। आप जो जी में आएं उसे कुछ भी साबित कर देते हैं। सबकी अपनी सोच हैं भैया.. ऐसा नही हैं कि जो मोदी को समर्थन नही करते हैं वो पाकिस्तान चले जाएं। मैं खुद मोदी का बहुत बड़ा प्रशंशक हूँ विरोधियों पे तंज भी कसता हूँ, उनका मजाक भी बनाता हूँ लेकिन कभी किसी व्यक्ति विशेष पे असभ्य भाषा का इस्तेमाल नही किया और न ही अपमानित करने की कोशिश की।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बहुत मायने रखती हैं और अगर उसके कुछ नकारात्मक परिणाम हैं भी तो..उसके लिए व्यवस्थाएं हैं, सिस्टम हैं। लेकिन ये स्वतंत्रता बहुत जरुरी हैं वरना महान लोकतंत्र में रहने का कोई फायदा नहीं। और इन स्वतंत्रता पे भड़ास निकालने वाले, टिपण्णी करने वाले, बस खुद सही और दूसरों को गलत साबित करने वाले..किसी मानसिक अवसाद से पीड़ित लोग हैं जो अपनी कुंठा को शांत करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। किसी भी नीचता तक जा सकते हैं।
आपकी आवाज से बहुत कुछ सीखने को मिला!👍
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