असमंजस

सीधा-साधा रास्ता भी मुझको,
अब लगता चौराहा-सा,
जाने किस धुन मे भाग रहा,
है हर इन्सा बौराया-सा.

पैसा-पैसा करता रह्ता,
है वो अमीर इतराया-सा,
जैसे-तैसे जीवन जीता,
है वो गरीब सकुचाया-सा.

ज्ञानी होने का ढोँग करे,
वो पढा-लिखा इठलाया-सा,
अनपढ है जो, वो भी बस यूँही,
है पडा हुआ अलसाया-सा.

किस राह से मुझको लक्ष्य मिले,
सोचे युवा भरमाया-सा,
जीवन की इस भाग-दौड मे,
है बालक घबराया-सा.

विज्ञान से सब सुख पा लूँगा,
सोचे मानव ललचाया-सा.
इतना बदला मेरा मानव??
सोचे ईश्वर पछताया-सा..!!!

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